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कुछ रोज़ साथ मैं तेरे बेठना चहता हुँ,
की अब तुमको में समझना चहता हुँ!
ये और बात के दूर हो कर बात होती है,
के अब करीब तुम्हारे रहना चाहता हुँ!!
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अब हर रोज़ याद आती हो मुझको तुम,
के अब मैं तेरी यादों में रहना चाहता हूँ!
मैं लड़ता हूँ बेवजह हर रोज़ तुमसे ही,
के करीब होकर अब मनाना चाहता हूँ!!
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तुम बिन दीदा-ए-बेनूर लगता है सब,
के अब हर रोज़ नूर देखना चाहता हूँ!
मुझको क़ैद दिखती है मुस्कुराहट तेरी,
के अब तेरे संग बैठे मुस्कुराना चाहता हूँ!!
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यूँ तो बहुत इशारे करती हो आँखों से,
बैठ सामने, मैं तुमको निहारना चाहता हूँ!
तुम बिखेरे रखती हो जुल्फ़ों को अपनी,
छांव उनकी मिले तो मैं सोना चाहता हूँ!!
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मदहोशी भी न पैमाने पीने से हुई मुझको,
के अब नश़ा-ए-इश्क़ तेरा ही चाहता हूँ!
डूबा ही रहा हूँ मैं अपने ख़यालों में हमेशा,
के डूबना मैं मोहब्बत में अब तेरी चाहता हूँ!!
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ये फासले भी कुछ देर और ठहरेंगे हमारे,
मैं हुए फासले तुमसे मिटाना चाहता हूँ!
हां चाहता मैं साथ हर पल तुम्हारा अब,
के ता-उम्र बस मैं तेरे साथ रहना चाहता हूँ!!
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