September 20, 2020

मुझसे उम्मीद रखती हो (Mujhse ummid rakhti ho) Part-II

! मुझसे उम्मीद रखती हो !

(Mujhse ummid rakhti ho)
Part-II

...On behalf of female...

बड़ा यकिन रखते हो खुद्द पर तुम
के तुम भी अब अकीदत मन्द हुए
के अभी तो आगाज भर ही था मेरा
और तुम आजमाईश मे दम तोड़ गए
...
Mujhse ummid rakhti ho Part-02
love-alienation
...
ये तो इफ्तदा-ए-इश्क़ अभी मेरी थी
के तभी चिलमन तेरी आँखों से रखी
तुम सारे अंजाम आखों से समझ गए
ये जुबां से अपनी तुम ही बतला गए
...
तू मोहब्बत रही मेरी मेने अपना भी लिया
गुजरा हुआ वो वक़्त मेने सब भुला भी दिया
के अल्फाज़ मेरे सारे ये क़ल्ब में रह गए
हाँ सब एक भुली सी याद मे सिमट गए
...
जख़्म अपना समझ मेने मरहम लगा भी लिया
मैं वाकिफ़ भी हुई तुमसे,गैर बना भी दिया
क़रीब तू आएगा ये मेरे अल्फाज़ ही रह गए
मशरूफ-ए-इश्क़ संग तेरे होना भी भुल गए
...
गम-ए-इश्क़ तेरा मेने अपना भी लिया
के तेरी छुवन से खुद को बिखेर भी लिया
के शराबोर जज़्बात मेरे होना भूल गए
के अब तेरी यादों मे रहना भी भुल गए
...
गुल-ए-शुर्ख इश्क़ का तेरा अपना भी लिया
इन लबोँ पर तेरा निशां सजा भी लिया
के बिछड़े जो तुमसे बेताब होना भूल गए
राजदां तुम हुए मेरे के फरेब भुल गए
...
तुझको खुद में इस कदर समा भी लिया
रहम-ए-दिल न कर तुझे अपना भी लिया
शुक्र तुमने मनाया के अब हम दूर हो गए
वीरान मेरा आशियां अब तुम ही कर गए
...
ख्वाबो मे तेरे संग अर्श को चूम भी लिया
चाहत तुमसे हुई के फना कर भी लिया
बरसती घटा जो अब के भीगना भूल गए
के अलहदा खुद को तुमसे हम कर गए
...
...v!p...
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शब्दों का अर्थ
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हिजाब - चिल्मन, पर्दा, शर्म
क़ल्ब - मन, दिल
मुद्दतों - समय
वाक़िफ़ - जानकार
मसरूफ़ -ए-इश्क़ - प्रेम में तल्लीन
शराबोर - तरबतर
इबारत-ए-इश्क़ - प्रेम की पटकथा
गुल-ए-सुर्ख़ - लाल गुलाब
राज़दाँ - विश्वास
अर्श - आसमान
घटा - बादल
अलहदा - अलग होना, दूर होना
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