एतबार(Aitbaar)
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मोहब्बत भी किरदार
सी नज़र आती है
ज़ोर-ए-आजमाईश़
भी करो तो फीकी
सी नज़र आती है
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आसान समझते सब है इसको
ये वो भी समझ जाती है
रास्तों को वो मोड़ चलता है
कि उसकी उलझन भी
अब समझ न आती है
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देखो ये उसकी नाराज़गी
सी नज़र आती है
कि उन्हें मनाते ही रहो
वो तब भी रुठी
सी नज़र आती है
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ये तो आग़ाज भर है इसका
वो दम तोड़ती सी नज़र आती है
कही मुक़म्मल की बाते है तुमने
के खुद ही असीर नज़र आती है
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ये केवल अल्फाज़ो मे सिर्फ
हकीकत सी नज़र आती है
कोई निभाता ही हो मगर
ये अदम सी नज़र आती है
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...v!p...
