बे-फ़िक्री सी(Be fikri si)
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वाकिफ़ तुम भी हो मेरी
बेवजह इस मोहब्बत से,
ख्व़ाबों मे सही मगर...
इसका करार तुमसे करुँ
तो तेरी जुल्फ़ संवारुँ
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ये ख़लिश भी अजीब सी
जो तेरे कश के धुएं सा,
के मैं घुलता सा नज़र आऊँ
इजाज़त हो सीने में तुम्हारी,
के कुछ देर ठहर भी जाऊँ
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तू धुएं में उड़ाता सा है
कश-ए-बे फ़िक्र मुझको
मैं जलता तेरे शौक भर को
सीने में तेरे कुछ देर ठहरुं
के थोड़ा सुकून में पा लूँ
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ये अंधेरा जो दिखता है
मेरे चारों और पसरा
जो तुमको इसमें ढूँढूँ
मैं तलाशूं अंजूम सा तुमको
मिलो तो मह-रु सा मानू
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...v!p...
